कांग्रेस: नेतृत्व का संघर्ष, अस्तित्व का युद्ध

September 20, 2018

2014 की अभूतपूर्व पराजय के बाद भी कांग्रेस ने कुछ नहीं सीखा। ना ही वो एक व्यवस्थित राजनीतिक संगठन के तौर पर काम कर पा रही है, इस हार की आज तक समीक्षा की है। सब इस भरोसे छोड़ दिया है कि अच्छे दिन तो आएंगे ही।

कांग्रेस का शीर्ष नेतृत्व भले ही एक कतार में खड़े होकर माकन के इस्तीफे को नकार दे, दिल्ली कांग्रेस में नेतृत्व की लड़ाई एक बार फिर से सड़कों पर है। दबी जुबान से ही सही, दिल्ली में पूर्व मुख्यमंत्री शीला दीक्षित और अजय माकन के बीच वर्चस्व की जंग की चर्चा हमेशा से ही रही है।
उनके आपसी मतभेदों का अंदाजा आप इसी बात से लगाइये की दीक्षित ने एक बार मीडिया के सामने ही माकन पर तंज़ मारते हुए कहा था, कि “हमें ध्यान रखना चाहिए कि अंदरूनी राजनीति न हो। दुर्भाग्य की बात है कि इस बात को नहीं समझते। उन्हें यह समझना होगा कि हमारी दुश्मन कांग्रेस नहीं है। हमारे विरोधी विपक्षी हैं। जिस दिन यह समझ आ जाएगा, सब ठीक हो जाएगा।”

अजय माकन के इस्तीफे का सच क्या है और कांग्रेस इससे कैसे पार पाएगी ये देखने वाली बात है, पर ये सच तो ये है की दिल्ली कांग्रेस और शीर्ष नेतृत्व के लिए अगले कुछ दिन मुश्किल भरे हैं।

पर ये फ़क़त दिल्ली कांग्रेस की ही बात नहीं है, देश भर में कांग्रेस का यही हाल है। मुसीबतें महाराष्ट्र और कर्नाटक में भी कम नहीं हैं। मुंबई में एकनाथ गायकवाड़, अमीन पटेल और बाबा सिद्दीकी के नेतृत्व में, नेताओं का एक तबका संजय निरुपम को प्रदेश अध्यक्ष पद से हटाने के लिए अखिल भारतीय कांग्रेस कमेटी (एआईसीसी) के महासचिव मल्लिकार्जुन खड़गे से मुलाक़ात करने में लगा है। यह लोग अब संजय निरुपम की जगह पूर्व आईटी मंत्री मिलिंद देवड़ा को अध्यक्ष पद पर बिठाना चाहते हैं। वजह क्या है ये तो वही जाने पर दबी जबान में ये मना जा रहा है कि निरुपम की मुख्यमंत्री फडणवीस से मुलकात महाराष्ट्र के नेताओं को कुछ ज्यादा रास नहीं आई।

कर्नाटक के हालात उससे भी खराब है। कांग्रेस नेताओं ने मुख्यमंत्री एचडी कुमारस्वामी के खिलाफ पूर्व मुख्यमंत्री सिद्धारमैय्या से शिकायत तक कर दी है। मंत्री ज़मीर और उनके साथियों ने सोमवार की सुबह सिद्धरामैया से मुलाकात की और बताने से नहीं चूके कि उपमुख्यमंत्री जी.परमेश्वर और कुमारस्वामी की नजदीकियां बढ़ रही हैं और कांग्रेस के नेताओं को दरकिनार किया जा रहा है।

135 साल पुरानी पार्टी जिसने आजादी के 70 सालों में में से 55 साल इस मुल्क पर बादशाहत की, वो मई 2014 की ऐतिहासिक पराजय के बाद राजनीति के नेपथ्य में चली गई। कांग्रेस के पतन की यह कहानी आज नहीं लिखी गई। पिछले 30 सालों में हुआ क्रमिक पराभव हुआ है, जिसकी पटकथा जाने अनजाने उनके शीर्ष नेतृत्व ने लिखी है।

2004 की पराजय का दर्द आज भी कांग्रेस को रह रह कर सताता है। एक असहनीय हार की वेदना और एक के बाद एक विफलताएं कांग्रेस की नियति बन गई हैं। कभी इस देश पर एकछत्र राज्य करने वाली पार्टी लगातार कमजोर हुई है। हद तो ये है की आज कांग्रेस के सामने एक क्षेत्रीय पार्टी के रूप में बदलने का खतरा मंडरा रहा है और राज्यो में उनके नेतृत्व की खींचतान जख्मो पर नमक छिड़क रही है।

अगर गौर से देखे तो ये कांग्रेस के सामने नेतृत्व से ज्यादा अस्तित्व का संकट है। अस्तित्व पर छाया कोहरा इसलिए भी घना है क्योंकि घेरे में गांधी-नेहरू परिवार भी शामिल है। एक वक़्त की अजेय कांग्रेस में विपरीत परिस्थितियों से लड़ने की इच्छा शक्ति ख़त्म होने लगी है और पार्टी को चलाने का सारा दारोमदार कुछ चुनिंदा आत्ममुग्ध नेताओं और एक परिवार के भरोसे छोड़ दिया गया है.

पार्टी में जो सचमुच के नीति नियंता हैं, उन्हें इस परिवार से वफ़ादारी दिखाने का ही विकल्प दिया गया है। पार्टी में जवाबदेही जैसी कोई व्यवस्था नहीं है, मतलब खाता न बही, जो एक परिवार कहे वही सही।
कांग्रेस पार्टी इस वक़्त घोर निराशा के दौर से गुज़र रही है। ना उनके रिपोर्ट कार्ड में गुड गवर्नेंस वाला कोई प्रदेश है और ना कामयाबी के चेहरे के तौर पर दिखाने के लिए एक भी सीएम है। कांग्रेस विफलताओं की वो इबारत है जहाँ ना बड़े पैमाने पर कोई संगठनात्‍मक अनुशासन है, ना विचारधारा में बदलाव की उम्मीद। ना इनके पास फैसले लेने लायक नेतृत्‍व बचा है और राजनीतिक इच्‍छाशक्‍ति‍।

2014 की अभूतपूर्व पराजय के बाद भी कांग्रेस ने कुछ नहीं सीखा। ना ही वो एक व्यवस्थित राजनीतिक संगठन के तौर पर काम कर पा रही है, इस हार की आज तक समीक्षा की है। सब इस भरोसे छोड़ दिया है कि अच्छे दिन तो आएंगे ही। अब कांग्रेस राहुल गाँधी के भरोसे है। विरोधी निपटा दिए गए है, अनुभवी नीति निर्धारको को चुप करा दिया गया है। अपने एक दशक से ऊपर के राजनैतिक जीवन में राहुल की छवि एक नेता काम एक अनिच्छुक और थोपे हुए गैर-राजनीतिक व्यक्ति की बनी हुई है। जिसे भारतीय राजनीति की शैली और तौर-तरीकों में कोई विशेष रूचि नहीं है।

राहुल अगर अपनी काबिलियत दिखा भी दें तो वो अकेले के दम पर पार्टी को इस संकट से उबार नहीं सकते। ये किसी से नहीं छुपा की खुद राहुल अभी तक स्वयं ही पार्टी में पूर्ण स्वीकृति नहीं पा सके हैं। अंदरखाने विरोध है पर साउंड प्रूफ दीवारों से छन के या तो आ नहीं पा रहा या आने नहीं दिया जा रहा। राहुल अपने निरंतर ध्वस्त होते गढ़ को बेबसी से देखने केा अलावा कुछ भी नहीं कर पा रहे है। कांग्रेस का गढ़ माने जाने वाले दक्षिण और पूर्वोतर भारत में तो उनकी पार्टी का नाम-ओ -निशाँ तक मिटने की कगार पर है।

पार्टी के भीतर नेताओं का एक बड़ा अनुभवी वर्ग है और बाहर आलोचक हैं, जो राहुल को चुनाव जिता सकने वाले नेता के तौर पर आज भी नहीं देखते। पूरे देश में कांग्रेस की राज्य इकाइयां मनमानी पर उतारू है। इन सभी पर राहुल गांधी की कोई पकड़ दिखाई नहीं पड़ रही है। कुल मिलकर कांग्रेस की लीडरशिप चाहे वो राष्ट्रीय हो या क्षेत्रीय, उसमे संकट के समय जोखिम लेने की क्षमता का अभाव साफ़ झलकता है.

संकट और भी हैं। कांग्रेस लाख दावे कर ले पर उसके शीर्ष नेतृत्व और जमीनी कार्यकर्ताओं के बीच तालमेल और संवादहीनता की स्थिति अत्यंत विकट है। मौजूदा पीढ़ी के नेताओं का कार्यकर्ताओं से ना कोई सीधा मेल मिलाप है न कोई सीधा संवाद। राहुल बस चुनावों के वक़्त सक्रिय होते हैं, बाकी वक़्त घूमने फिरने में बिताते हैं।

विचारधारा के मामले में भी कांग्रेस भ्रमित है। पार्टी में जो कुछ भी हो रहा है उससे साफ़ पता चलता है कि पार्टी में नेतृत्व, नीति-कार्यक्रम और रणनीति को लेकर असमंजस और बेचैनी है। आज आम कांग्रेसी का ही नहीं बल्कि कांग्रेस के बड़े नेताओं का भी मनोबल धराशायी है। इंदिरा गाँधी ने जिस दबंगई से कांग्रेस को चरम पर पहुंचाया और उनके बाद राजीव ने जिन मुश्किलों से हिचकौले लेती कांग्रेस को कुछ वक़्त और समंभाला, वो दबंगई और साहस सोनिया और राहुल गाँधी की कांग्रेस में कभी नहीं दिखी। चुनाव दर चुनाव कांग्रेस को नए-नए घाव मिले हैं, उसकी लोकप्रियता में जबरजस्त गिरावट आई है और पार्टी को बांधे रखने वाला सेनापति कमजोर साबित हो रहा है।

कांग्रेस अपने पतन के चरम पर है।

रवाँ है कश्ती मगर हर तरफ अँधेरा है।
किसी का दोष नहीं ये कसूर मेरा है।।

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